सोशल मीडिया नहीं सोच सुधारनी होगी

सरकार पब्लिक प्लैटफार्म को सुधारने की बात कर रही है, लेकिन लोगों को अपनी सोच को सुधारने की बात ही नहीं कर रही है। जब हम लोग अपनी सोच को सुधार लेंगे, सोशल मीडिया स्वतः ही सुधर जाएगा। सोशल मीडिया को सुधारने के बजाय हमें अपनी सोच को सुधारना होगा। तभी लोगों में नफरत फैलाने वाली, अफवाह फैलाने वाली, भड़काऊ संदेशों के सोशल मीडिया पर होने वाले प्रचार-प्रसार पर रोक लग सकती है।
सोशल मीडिया ऑपरेटरों अपने-अपने ढंग से सफाई देनी शुरू कर दी है। ट्विटर ने उन अकाउंट्स को बंद करना शुरू कर दिया है, जो उसके हिसाब से फर्जी हैं। वाट्सएप ने नए अपडेट के साथ ऐसी व्यवस्था की है कि अब अगर कोई संदेश फॉरवर्ड होगा, तो पता लग जाएगा कि यह मूल रूप से तैयार किया हुआ नहीं, बल्कि इधर का माल उधर वाला संदेश है। हालांकि इसका कोई बड़ा नतीजा निकलेगा, इसकी उम्मीद कम है। फर्जी खबरें बंद हो जाएंगी, यह यकीन नहीं है। ट्विटर पर लोगों को धकियाने, गरियाने या बेइज्जत करने का सिलसिला अभी नहीं रुका है। वाट्सएप पर अभी भी नफरत के किस्से गढ़ने वाले और हिंसक माहौल बनाने वाली चिंगारियां छोड़ी जा रही हैं। हालांकि यह भी जरूरी काम था और दोनों इसे दबाव आने से पहले ही कर देते, तो शायद ज्यादा अच्छा होता।
ट्विटर, वाट्सएप या उन सभी मोबाइल एप और वेबसाइट ने क्या किया, जिन्हें हम सोशल मीडिया कहते हैं? उन्होंने हमें इस भागदौड़ वाली जिंदगी में आपसी संपर्क के मंच दिए। वह स्थान दिया, जहां हम अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या अपने जैसे विचार वालों से संवाद कर सकें। संवाद से हमारी धारणा यह है कि बात करने से नजदीकियां बढ़ती हैं और गलतफहमियां दूर होती हैं। शायद एक-दूसरे से आमने-सामने बात करने के मामले में यह धारणा सही भी है। इंटरनेट के सोशल मीडिया ने हमारी इस धारणा की सीमा भी बता दी है। जहां बात आमने-सामने न हो और छद्म नाम के पीछे छिपने की सुविधा भी हो, वहां संवाद गलतफहमियां दूर तो पता नहीं कितनी कर सकता है, लेकिन उसे पैदा करने और फैलाने में बहुत कुशल साबित होता है। ऐसा करते हुए हम तीसरे के बारे में गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं और बाद में उसे चौथे या पांचवें तक पहुंचा सकते हैं। इसी तरह अफवाहों के बारे में सोचें, तो वे कोई नई चीज नहीं हैं, वे उस जमाने में भी थीं, जब कोई ऐसी तकनीक नहीं थी। तब भी उनकी वजह से दंगे होते थे। इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया ने वही काम किया है कि उसने संवाद का एक तेज माध्यम दिया, जिससे गलतफहमियां और अफवाहें बड़ी तेजी से बनती-बिगड़ती और फैलती हैं। नफरत पहले भी प्यार पर हावी रहती थी। इसमें वे लोग भी हैं, जिनकी दुकान या राजनीति इसी नफरत से चलती है, वे अब अपने काम को ज्यादा कुशलता से अंजाम दे लेते हैं। 
सोशल मीडिया से जुड़ी जो भी खबरें इन दिनों हमें मिल रही हैं, वे मोटे तौर पर सोशल मीडिया की नहीं, हमारे खुद के सामाजिक खोट की तरफ इशारा करती हैं। चाहे वह राजनेताओं से ट्विटर पर दुर्व्यवहार का मामला हो या फिर बच्चे चुराने या गोहत्या की अफवाहें फैलाकर किसी को भीड़ द्वारा मार दिए जाने का मामला हो। इनके पीछे की प्रवृत्तियां मोबाइल के किसी एप से नहीं निकलीं, बल्कि यह हमारे जनमानस के कोनों में बैठी कुंठाओं का अचानक उबल पड़ना है। हमारी ये समस्याएं मूल रूप से या तो सामाजिक हैं या राजनीतिक, हमारी दिक्कत यह है कि हम इनका तकनीकी समाधान निकालना चाहते हैं, जो शायद संभव नहीं है। तकनीक से कुछ चीजों को कुछ हद तक रोका जा सकता है, निगरानी तंत्र भी विकसित किए जा सकते हैं, लेकिन इन प्रवृत्तियों को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता। इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम पूरी तरह असहाय हैं, समस्या यह है कि हम समाधान तकनीक से मांग रहे हैं, समाज और राजनीति से नहीं मांग रहे। 
सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार पब्लिक प्लैटफार्म को सुधारने की बात कर रही है, लेकिन लोगों को अपनी सोच को सुधारने की बात ही नहीं कर रही है। जब हम लोग अपनी सोच को सुधार लेंगे, सोशल मीडिया स्वतः ही सुधर जाएगा। सोशल मीडिया को सुधारने के बजाय हमें अपनी सोच को सुधारना होगा। तभी लोगों में नफरत फैलाने वाले, अफवाह फैलाने वाले, भड़काऊ संदेशों के सोशल मीडिया पर होने वाले प्रचार-प्रसार पर रोक लग सकती है।

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

बहुत बढ़िया और सुधारा करो।

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