इस्लामिक आतंकवाद क्या है

Bangladesh faces less Islamic terrorism.. PHOTO.. Google
जहां भी जब भी कोई हमला हो तो सबसे पहले वहां पर इस्लामिक आतंकवाद की बात आती है। यानी कि जिन्होंने भी हमला किया वो इस्लाम को मानने वाले थे। बेशक इसको मुस्लिम संगठन नकारते रहते हों, लेकिन असल में यह इस्लामिक आतंकवाद ही है। विभिन्न आतंकी हमलों में शामिल दहशतगर्द इसके सबूत हैं, कि यह इस्लामिक आतंकवाद ही है। अब इसको समझने की आवश्यकता है कि आखिर क्यों इन दहशतगर्दों को इस्लामिक आंतकी कहा जाता है। 
आपने कई सारे आतंकी हमलों के वीडियो देखें हों। कई सारे फोटो देखें होंगे। और कहीं न कहीं आपको भी लगा होगा कि यह इस्लामिक आतंकवाद ही है, लेकिन उसको आप तय कैसे करें कि नहीं यह सही में इस्लामिक आतंकवाद ही है। तो चलिए बात करते हैं इस्लामिक आतंकवाद पर। जो भी आपने वीडियो, फोटो और सोशल मीडिया पर पोस्ट देखी होंगी। उसमें आतंकी खास तरह की वेशभूषा में होगा। हाथ में हथियार होंगे। बैग भी गोलियों, बम और कई अन्य विस्फोटकों से भरा हुआ होगा। आपके दिल में भय पैदा कर देगा, यह जो मंजर होगा। जब भी वीडियो आप देखेंगे उसमें जब भी दहशतगर्द हमला करेगा तो साथ में एक नारा भी गूंजेगा, अल्लाह हू अकबर।
कई सारे वीडियो में ऐसे भी आतंकी देखे जा सकते हैं, जिनके हाथ में मौजूद बैनरों पर कुरान शरीफ की आयतें लिखी होंगी। तो फिर कैसे न इसे इस्लामिक आतंकवाद कहा जाए। अगर मान भी लिया जाए कि वह इस्लामिक आतंकवाद नहीं है तो फिर मुझे यह बता दीजिए कि कब किस मुस्लिम ने इसका विरोध किया कि आतंकी संगठन कुरान शरीफ की आयतों वाले बैनरों का प्रयोग न करें। इससे इस्लाम की बदनामी होती है। शायद ऐसा आपने कभी नहीं सुना होगा। यह उन मुस्लिमों की मानसिकता और सोच पर सवाल है कि जब वह कहते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद नहीं है तो फिर आप इसका विरोध क्यों नहीं करते हो। पूरे विश्व में अभी तक जितने भी बड़े आतंकी हमले हुए हैं, वहां पर अल्लाह हूं के नारे क्यों लगे।  क्यों इन सभी मुस्लिम फिर एकजुट होकर ऐसे धर्म को बदनाम करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं। क्यों नहीं उनके खिलाफ आवाज उठाते हैं। मैं मुस्लिम धर्म को बदनाम नहीं कर रहा हूं लेकिन, यह सवाल हैं मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोगों से कि आखिर वह अपने धर्म को बदनाम होने से बचाने के लिए क्यों नहीं आवाज उठाते हैं। अगर सच में वह इस्लाम को मानते हैं तो वह आवाज क्यों नहीं उठाते हैं कि ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। आवाज न उठाना भी कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देने जैसा है। 
अगर सभी मुस्लिम चाहते हैं कि दुनिया से ऐसे दहशतगर्दों को मिटाया जाए तो उनको आवाज उठानी होगी। उनको एकजुट होकर आह्वान करना होगा कि इस्लाम को बदनाम करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाए और उनपर कार्रवाई हो। अगर सही में ऐसा होता है तो माना जा सकता है कि इस्लामिक आतंकवाद नहीं है। वरना मुस्लिमों भाइयों की चुप भी संदेहास्पद है, कि आखिर वह भी अपने धर्म को बदनाम होने से बचाने के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे हैं और इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना में साथ दे रहे हैं।

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