भगवान ने अगर मर कर परलोक में चले जाने वाले लोगों को भी बोलने का हक दिया होता, तो मुझे यकीन है हिमाचल की गुड़िया भी अब अपनी लम्बी निद्रा से जाग जाती। गुड़िया भारत की न्याय-व्यवस्था की आंख में आंख डालकर पूछती कि ऐसी घटिया मौत भले ही भगवान ने मेरे लिए रची थी, पर क्या यह भारत की कानून-व्यवस्था की हार नहीं है कि मेरे हत्यारे का सुराग अभी तक किसी के पास नहीं! क्यों हिमाचल प्रदेश पुलिस के आला दिमाग अफसर नाकाम रहे? क्यों सी.बी.आई. उसके अपहरणकर्त्ताओं और कातिल का चेहरा बेनकाब न कर सकी? इसके साथ ही गुड़िया जांच करने वाले अधिकारियों से पूछती की आखिर करीब साढे 3 महीनें गुजर जाने के बाद भी किसी आरोपी की पहचान नहीं कर पाए हो तो क्यों ना अपनी योग्यता की पोल खोल देते हो? गुड़िया की हत्या संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को अराजक और अनैतिक भीड़तंत्र भी साबित करती है। आप सब जानते हैं कि हमारे सामने 4 जुलाई 2017 को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के कोटखाई की गुड़िया का संदिग्ध परिस्थितियों में अपहरण हो जाता है और 3 दिन बाद पास के जंगल में उसका शव बरामद होता है। प्रारम्भिक जांच में गुड़िया के साथ दुष्कर्म होने की भी पुष्टि होती है। उसका अपहरण किसने किया, किसने दुष्कर्म किया, उसे किसने मारा अभी तफ्तीश जारी है। कुछ दिनों बाद पुलिस ने शक के आधार पर कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया। मुख्यमंत्री के अॉफिशियल पेज पर शक के आधार पर गिरफ्तार किए कथित आरोपियों की फोटो लगा ली जाती है कि पुलिस ने आरोपियों को पकड़ लिया है, लेकिन कुछ समय बाद फोटो हटा दी जाती हैं क्योंकि पुलिस जांच में यह सबूत नहीं पा सकी कि आखिर गिरफ्तार किए लोग ही आरोपी हैं। फोरैंसिक जांच में गिरफ्तार किए कथित आरोपियों के डीएनए गुड़िया के साथ रेप करने वाले आरोपियों के डीएनए से मेल ही नहीं खाया। जेल में कथित आरोपों के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों में से एक की संदिग्ध हालातों में मौत हो जाती है यानी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान।
अब मामला और उलझ गया कि पुलिस ने लोगों को किस आधार पर गिरफ्तार किया। फिर शुरू हो जाता है विरोध-प्रदर्शन, कोटखाई में पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया जाता है। प्रदेश भर के साथ राष्ट्रीय राजधानी में भी गुड़िया को इंसाफ दिलाने के लिए प्रदर्शन होता है। लोगों की ओर से गुड़िया को इंसाफ दिलाने के लिए जितना हो सकता था उन्होंने किया। हिमाचल सरकार का विपक्षी दल इस मामले को राजनीतिक तौर पर भुनाने की फिराक में है। प्रदर्शनों के बीच हिमाचल हाईकोर्ट के आदेशों के बाद मामले की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी जाती है।
हिमाचल सरकार के कुछ नेताओं का दावा है कि प्रदेश पुलिस ने तो अपने हिसाब से ‘केस’ सुलझा भी लिया था, पर कई अनसुलझे सवाल, जवाबों का इंतजार कर रहे थे, लिहाजा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। वह सीबीआई, जिसके पास जादुई चिराग है, जो किसी भी नामचीन से डरती नहीं और जो किसी भी उलझे से उलझे मामले को सुलझाकर रख देती है! यह बात अलग है कि कुछ लोग इतनी काबिल संस्था को ‘सरकार का तोता’ कहते हैं। सीबीआई टीम ने अब तक की विवेचना को उलट-पलटकर रख दिया। नए किस्से उछाले जाने लगे कि इसमें कई बड़े नेताओं का हाथ है। जेल में कैदी की मौत हो जाने के कारण प्रदेश पुलिस के आईजी सहित 8 पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों को सीबीआई हिरासत में ले लेती है। यह अपनी तरह का पहला मामला था जब सीबीआई ने किसी मामले की जांच के दौरान जांच कर रहे अधिकारियों को ही गिरफ्तार कर लिया हो। इसके बाद कई दिनों तक सीबीआई टीम विभिन्न पहलुओं पर जांच करती है और थे। ऐसा लगता था कि अपने रक्त रिश्ते घावों के साथ सलीब पर टंगा सच उस केंद्रीय एजेंसी के जादुई स्पर्श से सदेह अवतरित होकर रहेगा। पर हुआ क्या? सीबीआई ने बार-बार अपनी रिपोर्ट ‘दाखिल’ कर रही है और बार-बार जांच के लिए और समय मांग रही है।
अब, जब हाईकोर्ट ने यह मान लिया है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए लोगों के खिलाफ अभी प्रयाप्त सबूत नहीं हैं और एक कथित आरोपी को जमानत दे दी। सवाल उठता है कि कहीं कुछ ऐसा है, जो दबा है या दबा दिया गया है। क्या कोई षड्यंत्र रचा गया? या, पुलिस और सीबीआई अक्षम हैं? या, कहीं और चूक हुई?
उच्च न्यायलय द्वारा एक आरोपी को जमानत दिए जाने के बाद यह सवाल फिर से फन फैलाकर समूची व्यवस्था पर फुफकार रहा है कि आखिर गुड़िया का कातिल कौन? अब इस किंवदंती बनते हुए रहस्य पर से अगर कोई परदा उठा सकता है, तो वे हैं खुद गुड़िया। मगर करें क्या, मुर्दे की आत्माएं बोला नहीं करती।

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