पुराना समय याद है आपको, जब देश में मीडिया नहीं था। कोई भी सूचना आपको महीनों बीत जाने के बाद मिलती थी। वो भी लोग यहां वहां आएं जाएं तो ही यह संभव हो पाता था, लेकिन आज दौर बदल चुका है और सूचनाओं का आदान-प्रदान सैंकेडों के हिसाब से हो रहा है। चंद मिनटों में ही आप विश्व के किसी भी कोने की सूचना को आप अपने मोबाइल और टीवी पर देख सकते हैं। तकनीक के विकसित होने के साथ आप भी काफी सक्रिय हो गए हैं। आप चंद पलों मे विश्व की किसी घटना के बारे में सूचना हासिल कर लेते हैं। इन सूचनाओं के आदान-प्रदान में आपको पता ही है कि मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका है कि वो आपको हर पल अपडेट कर रहा है। जहां मीडिया लोगों को जानकारी दे रहा है कि वहीं मीडिया भारत में विकास को लेकर बातें करने में कम लेकिन देश को बांटने की प्रक्रिया में ज्यादा भूमिका अदा कर रहा है। चाहे वह सामाजिक तौर पर हो, राजनीतिक तौर पर हो या फिर धार्मिक और जातिय तौर पर। समाज को बांटने में मीडिया सक्रिय और निश्चित तौर पर अपनी भूमिका अदा कर रहा है।
अब मैं बात करूंगा एक ऐसे वर्ग की जिससे मैं भी जुड़ा हुआ हूं और अपनी रोजी रोटी भी यहीं से अर्जित कर रहा हूँ। लेकिन आज मैं जिस मीडिया वर्ग के साथ जुड़ा हुआ हूँ, थोड़ा उसी के बारे में बात करूंगा कि कैसे मीडिया समाज की बांट रहा है। अगर आप मीडिया को बड़ा मानते हैं तो अच्छी बात है मानना चाहिए, लेकिन मीडिया की साकारात्मक और नाकारात्मक भूमिकाओं पर गौर करो। अब आप कहेंगे कि मीडिया कैसे नाकारात्मक भूमिका अदा कर सकता है। भारतीय मीडिया विकास की बातें कम और चंद लोगों के गुणगान में ज्यादा विश्वास रखने वाला है क्योंकि जिनका गुणगान होगा वहां से लाखों के हिसाब से पैसा मिलेगा, तो फिर क्या है खुले दिल से करो खबरों में गुणगान, आपको तो बस पैसा इक्कट्ठा करना है। इसके लिए तो आप कुछ भी कर गुजरने से पीछे नहीं हटोगे। अब बात करूंगा कि कैसे समाज के लोगों को बांटने का काम कर रहा है।
पिछले कुछ सालों मे भारत में कई ऐसे कांड हुए जिन्होंने पूरे देश को हिला कर रख दिया। यह कांड ऐसे हैं कि खबरें मीडिया में आने से पहले अपने उस व्यक्ति की जाति क्या है, के बारे में शायद ही जानते होंगे, लेकिन जैसे ही मीडिया से खबर से प्रसारित हुई आपको उसकी जाति के बारे में पता चल गया। जो समाज जातिवाद से ऊपर उठ रहा था, फिर से उसी की गर्त में जा रहा है और पिछले कुछ सालों से मीडिया में दलित शब्द बहुत ज्यादा प्रचारित प्रसारित हो रहा है।
अब आपको दलित है क्या इसके बारे में बताता हूं। दलित शब्द की व्याख्या की जाए तो इसका अर्थ है कि पीड़ित, शोषण का शिकार और दबा कुचला हुआ या फिर रौंदा हुआ। पुराने समय में भी यह प्रथा थी। दलित ऐसा तबका था जिसको उच्च जाति के लोगों के बराबर के अधिकार प्राप्त नहीं थे। वह समाज में कुछ ऐसे कार्य नहीं कर सकते थे जो उच्च वर्ग या जाति से संबंध रखने वाले लोगों द्वारा किए जाते थे। लेकिन आधुनिक भारत यानी आजादी के बाद दलित वर्ग के कुछ नेता ऐसे आए कि उन्होंने वर्ग को अन्य जातियों और वर्ग के बराबर के अधिकारों के लिए जन आंदोलन खड़े किए। जन आंदोलनों की बदौलत इस वर्ग के लोगों ने आरक्षण शुरू करके अपने अधिकार प्राप्त कर लिए। आज यह वर्ग सरकार और प्रशासन में भी अपनी अच्छी खासी पहचान बनाए हुए है। आजादी के बाद जातिगत से लोग उपर उठने लगे थे तो अब मीडिया आगे आ गया। किसी भी मीडिया ने दलितों को लेेकर इस तरह की रिपोर्टिंग की कि वह वर्ग फिर से अपने आपको पिछड़ा हुआ और दबा हुआ महसूस करने लगा।
समाज में कुछ भी अत्याचार होने लगा तो मीडिया उसको एक इन्सान के तौर पर कम और उसके वर्ग के आधार पर लोगों के सामने खबरे परोसने लगा। इस वर्ग के लोगों को लगा कि हमारे साथ तो बड़ी ज्यादातियां होने लगी हैं। अब उसको कुछ करना पड़ेगा तो उसके पास भी एक ही रास्ता बचा कि वह अपने अधिकारों और वर्ग के संरक्षण के लिए फिर से आवाज उठाने पर मजबूर हो गया। कारण क्या था? कारण सिर्फ यह था कि मीडिया ने जो पेश किया उसने उस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी। और अपने आप को अन्य जातियों जो अपने आप को उच्च मानती हैं से अलग मान लिया। क्योंकि मीडिया ने खबर को इस तरह से पेश किया कि मानों अन्य वर्गों के साथ होता ही कुछ नहीं है। वैसा ही किसी धर्म विशेष और अन्य वर्गों के साथ होता है तो मीडिया इतना अधिक सक्रियता नहीं दिखाता। कारण यह है कि दलितों के नाम पर उसकी टीआरपी बढ़ती है और अन्य लोगों के बारे में इस तरह की खबर प्रसारित करने पर तो ऐसा लगता है जैसे सामान्य बात है और ऐसा होता रहता है। अगर उच्च जातियों के साथ होने वाला अन्याय सामान्य बात है तो दलितों के साथ होने वाला क्यों नहीं। मीडिया ऐसी भूमिका क्यों निभा रहा है जो लोगों में दूरियां बनाने में अहम रोल अदा कर रही है। लोगों को मीडिया के खिलाफ भी एकजुट होना चाहिए कि आखिर वह भेदभाव पूर्ण रवैया क्यों अपनाए हुए है। मीडिया की भूमिका ऐसे मामलों में बिलकुल ही समाज को विभाजित करने वाली है, जो सही नहीं है।
मीडिया को अपनी भूमिका साकारात्मक करनी होगी
अब बात यह है कि लोगों को विभाजित करने की बजाय मीडिया को समाज में मौजूद दूरियों को कम करने में अपना रोल अदा करना चाहिए। मीडिया दलित को दलित नहीं बल्कि एक इन्सान के तौर पर पेश करे तो बेहतर है। जहां विभाजन की बात आती है तो वहां पर एक समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। जहां-जहां भी विभाजन का दौर आया हैं वहां वहां हमेशा विनाश ही हुआ है और इसका इतिहास भी गवाह है। आपसी विभाजन के कारण ही भारत 200 सालों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा है। उस समय बेशक विभाजन जातियों के कारण नहीं हुआ था। लेकिन उसमें जो चंद धर्म के ठेकेदार बने थे उन्होंने भारत को गुलाम करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। और आज का दौर भी कुछ ऐसा ही है कि मीडिया लोगों को विभाजित करने में लगा हुआ है। मीडिया को किसी के साथ हो रहे अत्याचार को किसी जाति, धर्म, समुदाय से उपर उठकर एक इन्सान के साथ जोड़कर पेश करना चाहिए। परंतु आज के दौर में यह संभव नहीं लगता है क्योंकि आज के दौर में मीडिया सिर्फ सनसनी फैलाने में विश्वास रखने वाला बना गया है और वैसे ही पत्रकार।
अब बात यह है कि लोगों को विभाजित करने की बजाय मीडिया को समाज में मौजूद दूरियों को कम करने में अपना रोल अदा करना चाहिए। मीडिया दलित को दलित नहीं बल्कि एक इन्सान के तौर पर पेश करे तो बेहतर है। जहां विभाजन की बात आती है तो वहां पर एक समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। जहां-जहां भी विभाजन का दौर आया हैं वहां वहां हमेशा विनाश ही हुआ है और इसका इतिहास भी गवाह है। आपसी विभाजन के कारण ही भारत 200 सालों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा है। उस समय बेशक विभाजन जातियों के कारण नहीं हुआ था। लेकिन उसमें जो चंद धर्म के ठेकेदार बने थे उन्होंने भारत को गुलाम करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। और आज का दौर भी कुछ ऐसा ही है कि मीडिया लोगों को विभाजित करने में लगा हुआ है। मीडिया को किसी के साथ हो रहे अत्याचार को किसी जाति, धर्म, समुदाय से उपर उठकर एक इन्सान के साथ जोड़कर पेश करना चाहिए। परंतु आज के दौर में यह संभव नहीं लगता है क्योंकि आज के दौर में मीडिया सिर्फ सनसनी फैलाने में विश्वास रखने वाला बना गया है और वैसे ही पत्रकार।
सनसनी फैलाने के लिए मीडिया के लोग किसी भी घटना को घटना कम और हिन्दू, मुस्लिम और अन्य जातिगत समाचार बनाकर पेश कर रहे हैं। यह किसी भी प्रकार से ना तो देशहित में सही है, न ही मीडिया हित में और न ही तो किसी जाति, वर्ग, धर्म और समुदाय के हित में सही है। यह सिर्फ और सिर्फ समाज में एक खाई पैदा की जा रही है जो आगे बढ़ती जा रही है जो कभी खत्म नहीं होगी और समाज तिनके जैसे बिखर जाएगा। जो कुछ लोगों में संवेदनशीलता बची है वह भी नहीं रहेगी।

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