मोहब्बत भी रुह में नहीं उतरती

सुनो! रिश्ता कोई भी हो बेकार ही होता है
जब तक रिश्ते में इज्जत और यकीन न हो

मोहब्बत भी रुह में नहीं उतरती है यहां पर
जब तक दोनों के प्यार-ए-डोरी महीन न हो

जिन्दगी में ऊंचाई पर भी तो वही टिकता है
जिसने सफर-ए-मंजिल छोड़ी जमीन न हो

आपका किया कार्य कभी सफल नहीं होगा
जब तक तुम उसमें पूरी तरह प्रवीन न हो

करते रहो कार्य चाहे, तारीफ कहीं न होगी
जब तक आपका किया कार्य नवीन न हो

भव सागर से पार नहीं मिलेगा तुम्हें ‘रविन्द्र’
जब तक तुम पर भगवान का आमीन न हो

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