फिर आया चुनावी दौर है, करिए खूब विचार|
हाय ये जनता क्यों चाहती है, मानवीय सरकार||
हाय ये जनता क्यों चाहती है, मानवीय सरकार||
प्रगति की विरोधी ये शक्तियाँ, फैला रही विद्वेष|
अब होना ही चाहिए, परिवर्तित यहाँ परिवेश||
अब होना ही चाहिए, परिवर्तित यहाँ परिवेश||
समाज के भूखे-प्यासे वर्ग से, जिन्हें न प्यार|
सौदे वाली सोच की, दोबारा न लाना सरकार||
सौदे वाली सोच की, दोबारा न लाना सरकार||
मुद्दे को छोड़ संबिधान पर जो, करते हैं चोट|
देश भूल कर उनके हित में, कभी न देना वोट||
देश भूल कर उनके हित में, कभी न देना वोट||
जो जानें जनता की वेदना और न्याय स्वीकार|
उनके हाथों सौंपना, ''रविन्द्र'' देश की पतवार ||
उनके हाथों सौंपना, ''रविन्द्र'' देश की पतवार ||


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