बदलाव : कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही


जाने अनजाने में
मेरे दिल को
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही 
और मैं
आहत होता रहा

शायद उसने कभी मुझे
समझने की कोशिश
भी नहीं की हो
या फिर हर बार मैं ही
उसे समझ न पाया 
इसलिए वह
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही
और मैं
आहत होता रहा 

फिर भी कुछ समानांतर
ही रहा हमारा पग
और आगे बढ़ता रहा ……
वक्त बीतता रहा
पर वह आज भी
मन की दहलीज पर
है वहींखड़ी 

और मैं उस दहलीज को
लाँघ कर बाहर निकलने में
काफी हद तक सफल चुका हूँ
तभी तो आजकल
मेरा मन आहत नहीं होता

और आज मैं उसे
अच्छी तरह से
समझने लगा हूँ
उसे करीब से जानने लगा हूँ
उसके लिए विलुप्त हुआ 
मेरा प्यार दोबारा 
जागने लगा हैं
अब मेरा दिल कभी 
टूटता नहीं है बस 
प्यार में डूबा रहता हैं
धीरे धीरे
उसपर भी अब बदलाव
नजर आने लगा हैं
शायद वह भी
मुझे कुछ हद तक समझने लगी हैं
तभी तो हम दोनों आजकल
साथ में मुस्कुराते हैं

उसके दिल से शायद अब
फूल बरसते हैं
शायद काँटों को लांघकर 
निकलने का तरीका 
अब "रविन्द्र" उसने भी सीख लिया हैं l

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