
जाने अनजाने में
मेरे दिल को
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही
और मैं
आहत होता रहा
मेरे दिल को
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही
और मैं
आहत होता रहा
शायद उसने कभी मुझे
समझने की कोशिश
भी नहीं की हो
या फिर हर बार मैं ही
उसे समझ न पाया
इसलिए वह
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही
और मैं
आहत होता रहा
समझने की कोशिश
भी नहीं की हो
या फिर हर बार मैं ही
उसे समझ न पाया
इसलिए वह
कभी तोड़ती कभी जोड़ती रही
और मैं
आहत होता रहा
फिर भी कुछ समानांतर
ही रहा हमारा पग
और आगे बढ़ता रहा ……
वक्त बीतता रहा
पर वह आज भी
मन की दहलीज पर
है वहींखड़ी
ही रहा हमारा पग
और आगे बढ़ता रहा ……
वक्त बीतता रहा
पर वह आज भी
मन की दहलीज पर
है वहींखड़ी
और मैं उस दहलीज को
लाँघ कर बाहर निकलने में
काफी हद तक सफल चुका हूँ
तभी तो आजकल
मेरा मन आहत नहीं होता
और आज मैं उसे
अच्छी तरह से
समझने लगा हूँ
उसे करीब से जानने लगा हूँ
उसके लिए विलुप्त हुआ
मेरा प्यार दोबारा
जागने लगा हैं
अब मेरा दिल कभी
टूटता नहीं है बस
प्यार में डूबा रहता हैं
लाँघ कर बाहर निकलने में
काफी हद तक सफल चुका हूँ
तभी तो आजकल
मेरा मन आहत नहीं होता
और आज मैं उसे
अच्छी तरह से
समझने लगा हूँ
उसे करीब से जानने लगा हूँ
उसके लिए विलुप्त हुआ
मेरा प्यार दोबारा
जागने लगा हैं
अब मेरा दिल कभी
टूटता नहीं है बस
प्यार में डूबा रहता हैं

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