मैं हूँ तेरी परछाई



उनकी याद मुझे अब जो आई
खुशहाल चेहरे पर उदासी छाई
वो सामने आकर मुझसे बोली
मत भूल मुझे मैं हूँ तेरी परछाई


सुनकर बात विचलित हुआ मन
जान होकर भी बेजान हुआ तन
मेरी खातिर कोई फ
ना हुआ
मुझे बात अबतक 
 समझ आई

बहुत दिनों मैंने नजरअंदाज किया
उसने प्यार मुझे था समझ लिया
बात दिल की उसने दिल में थी रखी
मैंने ना ली थी प्यार की अंगड़ाई


आज क्यों प्यार-ए-अहसास हुआ
वो नहीं हैं तो मन क्यों उदास हुआ
"रविन्द्र" घुट- कर जीने से बेहतर
अब बना "संतोष" को अपना हमराही।।











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