ऐसा हंगामा तो न था मेरे गाँव में।

ऐसा हंगामा तो न था मेरे गाँव में।


गांवों में थे तो महफूज थी जिन्दगी
आज शहरों में आए तो रोज हंगामे
जिनसे हमें जिन्दगी का डर लगता है 
ऐसा हंगामा तो न था मेरे गाँव में।

कांटे थे तो क्या हुआ, अच्छे थे
उनके कांच-सा टूटने का डर नहीं
चेहरा दिखाए हकीकत-ए-जिन्दगी
वो कांच के टूकड़े हैं यहां पांव में।

कभी गांव में कांच-ए-रिश्ते जो टूटे
प्यार-ए-मरहम पट्टी ने जोड़े तमाम
यहां तो रिश्ते कौन जोड़े है किससे पर
टूटते हैं रोजाना जिन्दगी के नए दांव में।

हर कोई अकेले रहने की चाह रखे है
दुखों में नहीं खुशी पर टेढ़ी निगाह रखे है
रोज जलना फितरत हो गई है सभी की
नफरत साफ झलकती है उनकी छांव में

लाख भले है आज भी वो गांव के लोग
किसी की खुशी में जलने की ना है रोग
शहर के नाम से भी डरते हैं लोग ''रविन्द्र''
ऐसे दांव तो न चलते थे कभी मेरे गांव में
ऐसा हंगामा तो न था मेरे गाँव में।


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