पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के शनिवार को नतीजे घोषित हुए। त्रिपुरा ने सबको चौंकाते हुए अपनी बागडोर भाजपा के हाथ में सौंप दी है। राज्य के लोगों का मानना है कि उन्हें 25 वर्षों के बाद आजादी मिली है। लोगों ने कई उम्मीदों के साथ भाजपा के हाथों राज्य की कमान सौंपी है, लेकिन आगे देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा लोगों की उम्मीदों पर कितना खरा उतरती है।
भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा के लगातार दौड़ रहे विजयरथ को रोक पाना फिलहाल किसी के लिए संभव नहीं दिख रहा है। भाजपा पंजाब को छोड़कर कहीं भी एक साल में हुए विधानसभा चुनावों में हार नहीं सकी है। हां कई सीटों पर हुए उपचुनाव इसके अपवाद हो सकते हैं, लेकिन जिस तरह से भाजपा आगे बढ़ रही है, उसका मुकाबला करने के लिए लगभग देश भर के तमाम गैर-भाजपा दलों को एकजुट होना पड़ेगा।
वामदल के गढ़ त्रिपुरा की फतह और क्षेत्रीय दलों की सनक पर चलने वाले नागालैंड में मजबूत भाजपा के साथ राजग सरकार गठन के संकेत ने यह सिद्ध कर दिया है कि भाजपा की विचारधारा के प्रभाव से कांग्रेस ही नहीं वाम भी नहीं बच सकता है। त्रिपुरा में पहली सीधी लड़ाई में ही वाम चित हो गया है। वहीं मेघालय में त्रिशंकु विधानसभा ने फिर से कांग्रेस को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि वह जनता की अपेक्षाओं को समझने में नाकाम है। 60 विधानसभा सीटों वाले त्रिपुरा में भाजपा को तीन चौथाई सीटें मिली। नागालैंड में यूं तो पहले भी राजग की सरकार थी, लेकिन इस बार भाजपा ने वहां अपनी व्यक्तिगत स्थिति मजबूत कर ली। 10 साल से मेघालय में काबिज कांग्रेस अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। इस लिहाज से पूर्वोत्तर के 7 राज्यों में से अब 5 में भाजपा या राजग की सरकार होगी। अगर राष्ट्रीय स्तर की बात की जाए तो 22 राज्यों के साथ भाजपा का राजग शासन के अंदर देश की लगभग 68 फीसदी आबादी होगी।
नतीजे तीन छोटे राज्यों के आए हैं लेकिन उसके राजनीतिक अर्थ बहुत बड़े हैं। पहले जम्मू-कश्मीर, फिर असम और अब त्रिपुरा। भाजपा धीरे-धीरे न सिर्फ भौगोलिक सीमाओं पर जीत हासिल कर रही है बल्कि वैचारिक स्तर पर भी कांग्रेस के बाद वाम को हराने का साफ अर्थ है कि क्षेत्रीयता पर राष्ट्रीयता हावी होने लगी है। त्रिपुरा की बड़ी आबादी बंगाली है और इससे इनकार करना मुश्किल होगा कि इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल में भी दिख सकता है। ध्यान रहे कि त्रिपुरा में पहली पकड़ तब बनी थी जब त्रिपुरा विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के सात विधायक टूटकर भाजपा के पाले में आ गए थे। वाम को पस्त करने के साथ ही भाजपा के लिए केरल की लड़ाई भी मनोवैज्ञानिक रूप से थोड़ी आसान होगी। पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव 2021 में होने हैं। कर्नाटक का चुनाव डेढ़ महीने बाद है जहां भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई है। उसके बाद अधिकतर राज्यों में भाजपा को क्षेत्रीय दलों से लड़ना है और ऐसे में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजे ने भाजपा के रणनीतिकारों को बल दिया है। नागालैंड रणनीतिक रूप से अहम है।
गौरतलब है कि नागा पीस वार्ता को जमीन पर उतारने के लिहाज से यह जरूरी माना जा रहा था कि वहां राष्ट्रीय सोच की पार्टी सत्ता में मजबूत होकर आए और वहां अब भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।


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