हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ
है जब किसी पार्टी को बहुमत हासिल करने के बाद भी सरकार के गठन में काफी मुश्किलों
का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में सरकार के गठन को लेकर नेताओं की इतनी दौड़ भाग
पहली बार हो रही है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के भाजपा ने प्रेम कुमार धूमल
को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। बावजूद इसके धूमल चुनाव हार गए, और
सरकार के गठन में मुश्किल सी पैदा हो गई है। भाजपा 68 में से 44 सीटों जीतने के
बावजूद भी विधायक दल का नेता नहीं चुन पा रही है। कारण चुनावों से पूर्व धूमल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार
घोषित करना रहा है। अगर धूमल चुनाव जीत जाते तो शायद जो परिस्थिति आज बनी हुई वह
देखने को नहीं मिलती। धूमल की हार के कारण ही आज हिमाचल में बहमत हासिल करने के
बाद भी भाजपा सरकार का गठन नहीं कर पा रही है और हिमाचल भाजपा साफ तौर पर दोफाड़
हो चुकी है। जहां भाजपा के अधिकांश लोग चाहते हैं कि मंडी के जयराम ठाकुर को
प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए तो कुछ चाहते हैं जेपी प्रकाश नड्डा को केन्द्र से
वापस हिमाचल भेज कर राज्य की कमान सौंपी जाए। तो वहीं धूमल के समर्थक विधायक चाहते
हैं कि उनको ही मुख्यमंत्री बनाया जाए।
प्रेम कुमार घूमल के चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री
पद के लिए नामों पर चर्चा शुरू हो गई थी। भाजपा ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री
पद के लिए धूमल के नाम की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में केंद्रीय
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और संघ के करीबी अजय जम्वाल के नामों की चर्चा हो रही
थी लेकिन इन सबके बीच जयराम ठाकुर सबसे आगे निकलते दिख रहे हैं। हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री किसको बनाया जाए इसके लिए भाजपा
की केन्द्रीय समिति से लेकर हिमाचल के पर्यवेक्षकों तक की लगभग 4 दिन तक चली चर्चाएं
और बैठकें भी लगभग असफल सी नजर आ रही हैं। उनको भी मुख्यमंत्री का चयन करना किसी
टेढ़ी खीर से कम नहीं है। हारे हुए नेता को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे धूमल समर्थक
विधायकों का तर्क है कि क्रिकेट मैच में अगर कैप्टन 0 रन पर आऊट हो जाता है तो उसे
टीम से नहीं निकाला जाता है। उसी प्रकार हिमाचल के चुनावों में भी भाजपा ने जीत
हासिल की है तो उनका मानना है कि धूमल को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया
जाना चाहिए। खैर जो धूमल समर्थक यह विधायक कह रहे हैं कि कैप्टन के 0 आऊट हो जाने
से उसको टीम से नहीं निकाला जाता है तो फिर उनको यह भी सोचना चाहिए कि राजनीति और
खेल के मैदान में दिन-रात का फर्क है।
प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हारने के बाद भी
उनके समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग कर रहे हैं। भाजपा के तीन
विधायक उनके लिए अपनी सीट छोड़ने की बात भी कर चुके हैं. दूसरी तरफ, धूमल के धुर-विरोधी और
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा के करीबी माने जाने वाले पांच बार से मंडी
के सिराज से विधायक जयराम ठाकुर भी दौड़ में सबसे आगे बताए जा रहे हैं। दरअसल, धूमल बनाम नड्डा की लड़ाई
में भाजपा आलाकमान ने दोनों को ही मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर कर दिया है।
लेकिन, जयराम ठाकुर जे.पी. नड्डा
के गुट के माने जाते हैं जिनके नाम पर प्रेम कुमार धूमल का गुट अबतक राजी नहीं हो
पा रहा है।
भाजपा के हिमाचल के प्रभारी मंगल पांडे और
भाजपा के दो पर्यवेक्षक निर्मला सीतारमण और नरेंद्र सिंह तोमर ने लगातार अलग-अलग
बैठक भी की है, लेकिन, अबतक किसी नतीजे पर नहीं
पहुंच पा रहे हैं।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक जयराम ठाकुर ही इस वक्त मुख्यमंत्री पद की रेस मे सबसे आगे चल रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो प्रेम कुमार धूमल के बेटे और सांसद अनुराग ठाकुर को केंद्र में कोई अहम जिम्मेदारी देकर धूमल गुट को भी साधने की कोशिश हो सकती है। वहीं, भाजपा सूत्रों के मुताबिक, हारे हुए उम्मीदवार या सांसद को मुख्यमंत्री बनाए जाने की उम्मीद बेहद कम है। अगर ऐसा हुआ तो धूमल का पत्ता साफ हो जाएगा, जिसके बाद जयराम के नाम पर मुहर लग सकती है।
क्या धूमल को हटाना चाहती थी भाजपा
पिछले लंबे समय से चर्चा आ रही थी भाजपा धूमल
को किसी राज्य का राज्यपाल बना देगी।
भाजपा को पहले से ही आभास था कि धूमल के
नेतृत्व में हिमाचल भाजपा की गुटबाजी जारी रहेगी इसके लिए भाजपा हाईकमान ने उनको
हिमाचल की राजनीति से हटाने के लिए एक योजना तैयार की ताकि धूमल को लगे कि पार्टी
ने उनको नजरअंदाज नहीं किया है। हिमाचल को नया नेतृत्व देने के योजनावद्ध तरीके से
हटाने के लिए ही उनको उनकी परम्परागत सीट से हटाकर सुजानपुर से चुनावी मैदान में
उतारा गया। पार्टी हाईकमान देखना चाहती थी कि हिमाचल की राजनीति में धूमल का कद
क्या है और उनको हिमाचल की राजनीति से हटाना है तो सबसे पहले उनकी हार होना जरूरी
था। उसके बाद ही आगामी निर्णय लिया जा सकता था। क्योंकि जीत के बाद तो उनको न तो
मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश करने से रोका जा सकता था और न ही तो उनको राजनीति
से हटाया जा सकता था। अब जबकि धूमल चुनाव हार गए हैं तो उनको राज्य की राजनीति से
हटाने का रास्ता जहां साफ हो गया है वहीं वह मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी
ठोकने से भी कमजोर हो गया हैं।
हिमाचल में नया नेतृत्व
जरूरी
हिमाचल प्रदेश के विकास के लिए राज्य का
नेतृत्व किसी नए और युवा व्यक्ति के हाथों देना समय की जरूरत है। इससे जहां पार्टी
को अगले 15-20 वर्षों तक सत्ता में बने रहने का मौका मिल सकता है तो वहीं
प्रधानंत्री नरेन्द्र मोदी का राजनीति 75 वर्ष की आयु पार कर चुके लोगों को राजनीति
से बाहर करने का कथन भी पूरा होता है। अगर भाजपा मोदी की इस बात पर हिमाचल प्रदेश
के युवा भी भाजपा से प्रभावित होंगे और वाले चुनावों में इसका फायदा भी मिलेगा।
हिमाचल प्रदेश में पिछले 20 वर्षों से 2 ही व्यक्तियों का राज रह गया है, भाजपा
में जहां धूमल का नाम ही ज्यादा लिया जाता है तो वहीं कांग्रेस में वीरभद्र सिंह।
और हिमाचल की तरक्की की उम्मीद करनी है तो हर 5 वर्ष बाद सत्ता परिवर्तन और नए
व्यक्ति को प्रदेश की कमान देनी चाहिए। जहां वह अपनी राजनीति में वोट बैंक बनाने के
लिए अधिक से अधिक काम करेगा तो वहीं वह अपनी शिक्षा का फायदा लेकर प्रदेश को नई
ऊंचाई पर ले जा सकता है। इस पर सिर्फ कांग्रेस और भाजपा ही नहीं बल्कि आम लोगों को
भी ध्यान देना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को राजनीति में लाकर प्रदेश के विकास
में उनका सहयोग लिया जाए।
कांग्रेस के लिए सांत्वना
“धूमल की हार”
व्यक्तियों के गिर्द घूमने वाली भारत की चुनावी
राजनीति में बहुत उदार मन से यह स्वीकार करने की जरूरत है कि मोदी का जादू अभी भी
गुजरात के सागर तट से हिमाचल के हिम शिखरों तक सिर चढ़ कर बोलता है, चाहे आर्थिक और सामाजिक
परेशानियों के कारण उनके प्रति लोगों के मन में किसी भी तरह का गुस्सा या
गिले-शिकवे क्यों न हों।
हिमाचल में जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री के
चेहरे 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह के विरुद्ध निर्णायक रूप में सरकार बदली (एंटी
इन्कम्बैंसी) की भावना निर्णायक रूप में कार्यशील थी, वहीं उन पर भ्रष्टाचार और
घटिया गवर्नैंस के आरोप भी लग रहे थे इसलिए वह इस पहाड़ी राज्य की सत्तासीनों को
हर चुनाव में पटखनी देने की परम्परा को बदल नहीं सकते थे। वैसे भी 133 वर्ष पुरानी
कांग्रेस पार्टी के ‘युवराज’ राहुल गांधी ने अखाड़े
में कूदने से पहले ही व्यावहारिक अर्थों में हिमाचल को ‘‘हाथ से निकल गया’’ मान लिया था। पार्टी केवल
एक ही बात से खुद को सांत्वना दे सकती है कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का संभावी
चेहरा 73 वर्षीय प्रेम कुमार धूमल पराजित हो गए हैं। वैसे इस बात से भाजपा की जीत
का मजा किरकिरा नहीं हो जाता।

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