सबसे निम्न स्तर की ओर जाती भारतीय राजनीति

भारतीय राजनीति की प्रवृति वर्तमान में सबसे निम्नतम स्तर की ओर निरंतर अग्रसर है। सत्ता की भूख और संकीर्ण मानसिकता लगातार राजनीति पर हावी होती जा रही है। किसी भी नेता पर देश के विकास का दायित्व होता है, उनसे सकारात्मक, रचनात्मक, विकासात्मक भूमिका और सोच की उम्मीद की जाती है, लेकिन आज नेताओं की भाषा जिस तरह से दूषित और एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए प्रयोग की जा रही है वह आम लोगों की समझ से परे है। विषाक्त भाषा, निम्नतम और घृणित शब्दों के चयन करने की नेताओं में होड़-सी लगी है। समाज को जाति ,धर्म और वर्ग में बांटने वाले ये नेता ही हैं। इन नेताओं की सोच इतनी घटिया और दूषित हो गई है कि शब्दों के चयन में अनपढ़ और सड़कछाप गुंडे को भी पीछे छोड़ दें। बोलने से पूर्व बाद में होने वाले परिणाम के बारे में यह नेता तो सोचते ही नहीं। 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह प्रवृत्ति और भी ज्यादा मुखर हो गई है। कांग्रेस की नजर में सत्ता जन्मसिद्ध अधिकार है और दूसरा कोई देश की बागडोर संभाल ही नहीं सकता। परन्तु सत्ता जाने के बाद कांग्रेस के नेता इस कदर हताश और निराश हो चुके हैं कि आरोप प्रत्यारोप में देश के सांवैधानिक पद की गरिमा को बार-बार कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 

कांग्रेसी नेता लगातार खिसकते जनाधार के कारण क्या हैं इसकी समीक्षा और इस पर आत्ममंथन करने की बजाय देश की जनता को वोट देने के निर्णय की गलती का अहसास करवाना चाहते हैं कि प्रचंड बहुमत से चुनी गई मोदी सरकार का समर्थन जनता की भूल है। ऊपर से कांग्रेस के नेताओं पर किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं है। दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मल्लिकार्जुन खड़गे व आनंद शर्मा जैसे नेताओं का व्यक्तित्व जनता की दृष्टि में नकारात्मक ही है। इनके आह्वान पर कोई मतदाता मत नहीं देगा। यदि ऐसे लोगों की रैली हो तो सिर्फ आयोजक ही दिखाई देंगे श्रोता नहीं, कांग्रेस को इन नेताओं से कोई लाभ भी नहीं होने वाला है, हाँ ये बीच बीच में अपने अमर्यादित वक्तव्यों से कांग्रेस को नुकसान अवश्य पहुँचा रहे हैं। 

मणिशंकर अय्यर का प्रधानमंत्री को “नीच” वाला सम्बोधन ने गुजरात चुनाव में कांग्रेस के ताबूत में कील ठोकने का काम किया है। बीजेपी के भी नेता इसमें पीछे नहीं हैं, विवादित बयान देने में। नियंत्रण इनके नेताओं पर भी नहीं है। जो भी हो यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र के लिए कदापि फलदायी नहीं है।

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