आवाज

रास्ते से गुजर रहा था मैं
मेरे साथ साथ नदी
गुजर रही थी
पता नहीं क्य हुआ
मुझे उसने आवाज़ दी
ए-जाते हुए राही
मेरा हाल भी देखा है कभी
मैं सन सा राह गया
ये आवाज़ किसने दी
मैं फिर नजर अंदाज़ कर
कुछ आगे निकला फिर
मुझे उसने आवाज़ दी
मैं तुझे ही नहीं हर जाने 
वाले को आवाज़ देती हूँ
आज मैं बीमार हो चुकी हूँ
हर कहीं से गंदगी आकर
मुझ मैं मिल रही है, यह
मुझे उसने आवाज़ दी
मैं रोज़ कल-कल करके
ठंडी वादियों में बहती थी
आपके हाथों से फेंके पथरो
की चोटों को भी सहती थी
आज मैं बीमार हूँ तो
मेरे पास कोइ नहीं आता
मुझे उसने आवाज़ दी
बड़ी देर तक सोच में
पड़ा रहा की आखिर
कौन है वो
दर्द बायाँ कर रही है जो
फिर एक पानी की लहर
मेरे मुँह पे आकर गिरि
और आवाज़ आई
मैं नदी हूँ
मुझे उसने आवाज दी

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