कौन हैं यह जो सरकार बने हैं
चंद नेताओं के चाटुकार बने हैं
समझ नहीं है इक समाचार की
देखो तो ये बड़े पत्रकार बने हैं
रिश्वत लेते कई पत्रकार धरे हैं
लोगों के लिए आज भी खरे हैं
खबर भी न लगी किसी पत्र में
मिलकर इन के परिवार बने हैं
देखो आज कई अखबार बने हैं
कई अनपढ़ भी पत्रकार बने हैं
छप चुके हैं ऐसे हजारों कागज
जो कि अफवाही समाचार बने हैं
कोई न पूछे क्या समाचार बने हैं
कहीं देखो गुंडे तो पत्रकार बने हैं
इन पत्रकारों का करें क्या रविन्द्र
ये मालिक नेता के चाटुकार बने हैं।

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