सोमवार 8 अगस्त को हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह गद्दी सामुदाय को लेकर विवादित बयान देते हैं (प्रैजीडैंट होने से क्या होता है, प्रैजीडैंट कुछ नहीं होता, प्रैजीडैंट तो गद्दी सभा के भी होते हैं)। उसके बाद मंगलवार यानी 9 अगस्त को जनता को संबोधित करते लोगों को किसी भी सामुदाय के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग न करने की सलाह देते हैं और खुद वैसे बयान देते हैं। उसके बाद 10 अगस्त को मुख्यमंत्री धर्मशाला में कहते है कि मेरे बोलने का मतलब था कि सत्तपाल सिंह सत्ती से बड़ा अध्यक्ष तो हमारे गद्दी बोर्ड में हैं। इस तरह के बदलते बयानों से जहां गद्दी सामुदाय के लोगों में प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ रोष व्याप्त हो गया है तो कई जगह पर प्रदर्शन भी हुए लोगों पर पुलिस ने लाठियां भी भांजी। इतना सब होने के बाद अब गद्दी सामुदाय पर ही राजनीति शुरू हो गई है।जिस तरह से इस मामले में गद्दी सामुदाय के नेताओं से विरोधी की उपेक्षा की जा रही थी, लगभग सब कुछ उसके उल्टे हुए। कुछ सत्तारूढ़ दल के नेताओं के साथ-साथ विपक्षी पार्टी के नेता भी इसमें शामिल हैं। अगर सही में सत्तारूढ़ दल के वह अपने गद्दी भाईचारे के साथ थे तो उनको अपने पदों से इस्तीफा देकर गद्दियों को एकजुट करना चाहिए था, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जाता ताकि इस तरह की कम आंकने वाली टिप्पणी दोबारा न होती। लेकिन उन्होंने उलटा वीरभद्र सिंह की फेवर में बयानबाजी करके मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी पूरे सामुदाय के लोग दुखी हैं।
जो भी गद्दी सामुदाय के नेता हैं वो कहीं न कहीं अपनी स्वार्थ के लिए गद्दियों को भटका रहे हैं और विरोध प्रदर्शन करवाने की फिराक में हैं जो किसी भी कीमत पर सही नहीं हैं। गद्दी जिनको भोला-भाला कहा जाता है आज इतना समझदार हो गया है कि कौन उसके साथ अच्छा कर रहा है और कौन बुरा।
खैर मेरा इतनी बातें लिखने का सिर्फ एक ही मकसद है कि गद्दी समुदाय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

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