आखिर कैसा होना चाहिए नेता?

क्यों होती है हमें एक अच्छे नेता की जरूरत? और एक अच्छा नेता किसे कह सकते हैं? मैं बताता हूं कि कि कैसे खुद से भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य लेकर चलना और व्यक्तिगत सीमाओं से परे उठना ही किसी भी नेता के जरुरी गुण हैं।

नेता को कार्यों को सम्भव बनाना चाहिए
नेतृत्व या नेतागिरी मुख्य रूप से सफलता पूर्वक कार्यों को करने या संभव बनाने की कला है। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे देश में स्थिति ठीक इसके उल्टी है। यहां अगर आप काम को होने से रोक सकते हैं तो आप नेता बन सकते हैं। अगर आप सरकार में हैं तो विपक्ष में रह कर काम-काज ठप्प करवा सकते हैं, चलते हुए विकास कार्य को ठप्प शहर बंद कर सकते हैं, सडक़ पर उतर कर आंदोलन सफल करवा सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आप नेता बन सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि देश के विकास को रोकने की कला आपको नेता बना रही है।

नेता के पास खुद से भी बड़ा लक्ष्य होना चाहिए
आखिर नेता बनने का मतलब क्या है? कोई भी शख्स तब तक खुद को नेता नहीं कह सकता, जब तक कि उसके जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य न हो जो उससे भी बड़ा हो।
नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए। अपनी व्यक्तिगत जीवन-यापन की ङ्क्षचताओं से परे जाकर वह जीवन को एक बड़े फ लक पर देख रहा होता है। नेता का मतलब है, एक ऐसा व्यक्ति जो उन चीजों को देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते। ऐसा न हो तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर एक नेता भी वही चीजें कर रहा है, जो हर कोई कर रहा है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर उसकी भी वही सोच है जो हर किसी की है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। तब तो नेताओं के बिना हम और बेहतर कर सकते हैं।

नेता का व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढना
व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढकऱ सोचने लगता हैए महसूस करने लगता हैए और कार्य करने लगता है। व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढकऱ सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है। ऐसा कई बार वह किसी बड़े स्तर पर हो रहे अन्याय की वजह से, तो कई बार संघर्ष के पलों में वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ जाता है। कई बार कुछ लोगों के भीतर की करुणा इतनी भयंकर हो जाती है कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर सोचने लगते हैं और खुद को ऐसे कामों और विचारों के साथ जोड़ लेते हैं जो उनके निजी स्वार्थों से संबंधित नहीं होते। या फिर कोई इंसान निजी महत्वाकांक्षा के कारण भी नेता बन सकता है। शक्तिशाली बनने की उसकी प्रबल महत्वाकांक्षा उसे आगे बढ़ाती है और वह नेता बन जाता है। कई बार किसी खास परिवार में जन्म लेने से भी आप नेता हो जाते हैं।

नेता के लिए भौतिकता से परे का अनुभव जरुरी है
लेकिन कोई शख्स सही अर्थों में तब तक नेता बन ही नहीं सकता जब तक उसके जीवन का अनुभव और जीवन को देखने का तरीका उसकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे न चला जाए। यानी नेता बनना या कहें नेतृत्व एक स्वाभाविक प्रक्रिया तब तक नहीं होगी, जब तक कि वह जीवन को देखने, समझने व महसूस करने के तरीके में एक व्यक्ति की सीमाओं से परे नहीं चला जाता।

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