यादों का मेला

तेरी यादों का सजा कर मेला
गली गली घूमे है रविन्द्र अकेला

मैं हूँ तेरा पगला सा दीवाना
हो लेता हूँ हर कहीं से रवाना

कई देख मुझे गले लगा लेते हैं
कई देख दर्द में मुस्कुरा लेते हैं

बस यही तो अपना किस्सा है
सुख-दुःख जीवन का हिस्सा है

कोई लाखों पाकर भी खुश नहीं
हमें कुछ ना पाकर भी दुःख नहीं

यहाँ नसीब तो अपना अपना है
कोई पूरा तो कुछ सिर्फ सपना है

गम न कर कि तुझे क्या मिला है
यह तो तेरे अधूरे प्यार का सिला है

करनी है गर दिली मोहब्बत रविन्द्र
बना ले दिल में उसके प्यार का मंदिर

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