कुछ अधूरे सपने....



रोज की तरह कर रहा था सोने की तैयारी मैं
सजाकर सपनों की झिलमिलाती फूलवारी में

एका एक जगा दिया मेरे एक दिली ख्याल ने
नाजुक दिल में घर कर लिया कड़वे सवाल ने

जिन्दगी में पल-पल धीमी-सी मौत मर रहा हूँ
पता भी नहीं चला कि कब मैं क्या कर रहा हूँ

एक वो है कि रोजाना इम्तहान लिए जा रहा है
और कमबख्त  दिल मेरा क्या किए जा रहा है

कुछ सवाल दिल में आकर रोज ही खो जाते हैं
मैं रात भर जागता रहता हूँ तो लोग सो जाते हैं

कुछ ख्याल दिल में आए तो हलचल सी होती है
कमल कमबख्त चलती है तो आंख मेरी रोती है

आंखों में बस सपने बुनेगा तो कहाँ आएगी निंद्र
पता नहीं चलता कि क्या हो रहा है तुझे "रविन्द्र"

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