हमारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार जरूरी

किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति का निर्माण उसके जीवन, उसके आचरण के अनुरूप ही होता है। उसका जीवन तथा आचरण का मूल आधार है उसकी शिक्षा। कहा गया है “जैसा खावे अन्न वैसा बने मन।” यहाँ पर अन्न का अर्थ भोजन है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार का होता है। इसलिए यह सिद्ध होता है कि आजकल मानव समाज में जो तरह-तरह के छोटे-बड़े दोष और कमियां दिखती हैं, उनका मूल ही शिक्षा है।

आजकल हर जगह शिक्षा प्रसार की नई-नई योजनाएं बन रही हैं। केंद्र सरकार इसकी घोषणा भी कर चुकी है कि वह शीघ्र ही देश से निरक्षरता मिटा देगी। मगर विचार यह करना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली कैसी है और वह किस प्रकार के जीवन का निर्माण कर रही है तथा शिक्षा वास्तव में कैसी होनी चाहिए। वर्तमान शिक्षा पद्धति को सात शत्रु बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। मस्तिष्क, दंड, परीक्षा, कुरूप भवन, अत्यधिक कार्य, स्वाभिमान रहित अध्यापक तथा संकुचित मनोवृत्ति के माता-पिता। 
बेचारे विद्यार्थियों को इतनी अधिक पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं, इतने प्रकार के विषयों का अध्ययन करना पड़ता है कि उनका दिमाग, शरीर और मन सब कुछ बुरी तरह से पिस जाता है। भाँति-भाँति के दण्ड और हर समय परीक्षाओं का डर उसे खाए जाता है। सिवाय पढ़ने और पढ़कर परीक्षा पास करने के वह कुछ और सोच ही नहीं सकता। गंदे और तंग मकानों में गंदे टाटों या गंदी और भद्दी मेज-कुर्सियों पर बैठकर उन्हें पढ़ना पड़ता है, अतः उनके लिए स्वच्छ वायुमण्डल एक दुर्लभ पदार्थ है। स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक विद्यार्थियों को केवल इसलिए पढ़ाते हैं कि उनकी नौकरी बनी रहे, विद्यार्थियों के भले-बुरे से उन्हें कोई मतलब नहीं। वे हमेशा अपने ट्यूशन की चिंती में लगे रहते हैं और धन कमाने के लालच में अपने स्वाभिमान, गुरुत्व और शिक्षक पदवी के महत्व को गंवा बैठते हैं।
विद्यालय के बाहर घर पर भी विद्यार्थी का यही हाल रहता है? घर पर वह जब तक कम से कम चार घंटे नित्य नियमपूर्वक न पढ़ें, तब तक अध्यापक द्वारा बताया घर पर किया जाने वाला काम पूरा नहीं होता और फिर इन सबके ऊपर है उस पर सवार नौकरी का भूत। बालक को दिन-रात किताबों से चिपके देखकर माता-पिता को पूरा विश्वास हो जाता है कि उनकी साधना तथा बच्चे की तपस्या दोनों ही सफल है। बड़ा होने पर उसे अवश्य ही कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी। अच्छी नौकरी पाना ही जब सब प्रकार से जीवन का उद्देश्य हो जाए तो मानसिक विकास का प्रश्न ही कहाँ रहता? आजकल तो विद्या और नौकरी एक दूसरे के पूरक बन गए हैं। ऐसी हालत में प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ-साधना में तल्लीन रहेगा, इसके सिवाय उससे और किस बात की आशा की जा सकती है? ऐसा व्यक्ति समाज के कल्याण की ओर क्या ध्यान दे सकता है?

आजकल की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में बहुत दोषयुक्त हो गई है। इसको मिटाकर ऐसी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करनी होगी जो व्यक्ति को अपने ऊपर जीत हासिल करने के काबिल बना सके। ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही होना चाहिए। 

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